साहित्य समाजक सापेक्ष सृजित होइत अछि। मानवक जीवन-यापनक पद्धतिमे समयानुकूलता जेना-जेना परिवर्त्तन होइत छैक, तहिना साहित्यमे सेहो परिवर्त्तन होइत छैक। रचनाकार एहि परविर्त्तन केँ कथ्य, शिल्प आ प्रस्तुतिक माध्यमे अपन रचनामे अभिव्यक्त करैत अछि। एहि परविर्त्तनक अभिव्यक्ति विभिन्न ढ़ंगक परिणाम स्वरूप नव-नव प्रवृत्तिक जन्म होइत छैक।१ कथा एकर एकटा विलक्षण दृष्टांत अछि। कथाक रचनाक आधार प्रमुख प्रवृत्तिक होयब अस्वाभाविक नहि होइत अछि। ई सुधारवादी, आदर्शवादी, ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक, भावात्मक, मनोविश्लेषणात्मक, कामपरक, हास्य-व्यंग्य, राजनैतिक, प्रगतिवादी, यथार्थवादी, समाजवादी, जनवादी आदि होइत अछि। एहि प्रवृति केँ मैथिली साहित्यक मर्मज्ञ कथाकार डॉ. अशोक कुमार मेहता, एखन धरि मैथिलीमे उपलब्ध कथाक आधारपर प्रमुख प्रवृत्तिकेँ रेखांकित उपरोक्त रूपेँ कयलनि अछि। ओ कथा मादे कहैत छथि- साहित्य समाजक सापेक्ष सृजित होइत अछि। मानवक जीवन-यापनक पद्धतिमे समयानुकूल जेना-जेना परिवर्त्तन होइत छैक, तहिना साहित्यमे सेहो परिवर्त्तन होइत छैक। रचनाकार एहि परिवर्त्तन केँ कथ्य, शिल्प आ प्रस्तुतिक माध्यमे अपन रचनामे अभिव्यक्त करैत अछि। एहि परिवर्त्तन अभिव्यक्तिक विभिन्न ढ़ंगक परिणाम स्वरूप नव-नव प्रवृत्तिक जन्म होइत छैक। जे ऊपर अंकित कयल गेल अछि।