आस्था, उम्र और मानसिक जड़ताः विश्वास-स्थायित्व का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
डॉ. संजय कुमार, , सहायक प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुर, एल.एन.एम.यू. दरभंगा.

DOI: 10.70650/rpimj.2025v1i2000016
DOI URL: https://doi.org/10.70650/rpimj.2025v1i2000016
Issue: Vol. 1 ★ Issue 2 ★ October - December 2025
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सारांश:

मानसिक जड़ता (Cognitive Rigidity) और विश्वास-स्थायित्व (Cognitive Rigidity) मानव चिंतन के ऐसे पक्ष हैं, जो व्यक्ति की आयु, मस्तिष्कीय विकास, सामाजिक अनुभव तथा सांस्कृतिक परिवेश से गहराई से जुड़े होते हैं। यह लेख विभिन्न आयु-समूहों में मानसिक जड़ता के विकासात्मक क्रम का विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा यह स्पष्ट करने का प्रयास करता है कि व्यक्ति विरोधाभासी तथ्यों के बावजूद अपने विश्वासों को क्यों बनाए रखता है। यह अध्ययन तंत्रिका-विज्ञान, विकासात्मक मनोविज्ञान, सामाजिक मनोविज्ञान तथा संज्ञानात्मक विज्ञान के शोध निष्कर्षों पर आधारित एक समग्र समीक्षा है। उपलब्ध शोधों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि मानसिक लचीलापन तीसरे दशक (20-30 वर्ष) से धीरे-धीरे घटने लगता है, 50-60 वर्ष के बीच इसमें तीव्रता आती है और 60 वर्ष के बाद यह अधिक स्पष्ट रूप ले लेता है। हालाँकि यह प्रक्रिया पूर्णतः जैविक नहीं है। मानसिक सक्रियता, शारीरिक व्यायाम, सामाजिक सहभागिता तथा आजीवन सीखने की प्रवृत्ति जैसे कारक मानसिक जड़ता की तीव्रता को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। लेख यह प्रतिपादित करता है कि मानसिक जड़ता कोई अपरिवर्तनीय नियति नहीं, बल्कि जीवन-शैली और मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेपों द्वारा प्रभावित की जा सकने वाली प्रक्रिया है।

मुख्य शब्द:मानसिक जड़ता, विश्वास-स्थायित्व, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, पुष्टिकरण पक्षपात, वृद्धावस्था।